फ़ंडरेज़िंग — पैसा जुटाना

प्रिया को पैसे चाहिए

बुधवार की शाम है, हल्द्वानी। प्रिया पुष्पा दीदी की चाय की दुकान में बैठी है, लैपटॉप पर एक स्प्रेडशीट घूर रही है। नंबर्स झूठ नहीं बोलते। उसका एग्री-टेक ऐप — PahadiDirect — आठ महीने से चल रहा है। 340 फ़ार्मर्स तीन डिस्ट्रिक्ट्स में ऑनबोर्ड हैं, 1,200 एक्टिव बायर्स हैं, मंथली GMV ₹12 लाख है। उत्पाद काम कर रहा है। फ़ार्मर्स को बेहतर दाम मिल रहे हैं। बायर्स को ताज़ा माल।

लेकिन पैसे ख़त्म हो रहे हैं।

Bangalore की जॉब से बचाए ₹8 लाख लगभग ख़र्च हो चुके हैं। दो डेवलपर्स को अपनी जेब से पे कर रही है। सर्वर लागतें बढ़ रहे हैं। एक सही टीम चाहिए — डिज़ाइनर, फ़ील्ड संचालन वाला, लॉजिस्टिक्स सँभालने वाला। ऐप का वर्शन 2 बनाना है — पेमेंट इंटीग्रेशन, बेटर रेकमेंडेशन इंजन।

उसने हिसाब लगाया। अगले 18 महीने बचने और ज़रूरी चीज़ें बिल्ड करने के लिए ₹75 लाख चाहिए।

"पुष्पा दीदी," वो बोलती है, "मुझे पैसे रेज़ करने हैं। रियल मनी। निवेशक से।"

पुष्पा दीदी ताज़ी चाय रखती हैं। "बेटा, मैं ये निवेशक-श्वेस्टर नहीं समझती। लेकिन एक बात जानती हूँ। जब मुझे दुकान रेनोवेट करवाने के लिए पैसे चाहिए थे, बैंक गई — तीन महीने दौड़ा दिया। पैसे वाले नचाते हैं। सम्भलके।"

प्रिया मुस्कुराती है। पुष्पा दीदी सही बोल रही हैं — लेकिन कोई और रास्ता भी नहीं है।

ये चैप्टर स्टार्टअप के लिए बाहर से कैपिटल रेज़ करने के बारे में है। ख़ासतौर पर प्रिया जैसे फ़ाउंडर्स के लिए जो टेक्नोलॉजी बिज़नेस बना रहे हैं और राजस्व से ज़्यादा तेज़ बढ़त के लिए पैसे चाहिए।

ज़रूरी बात: इस बुक के ज़्यादातर बिज़नेसेस — पुष्पा दीदी की चाय, भंडारी अंकल की हार्डवेयर शॉप, नीमा-ज्योति की होमस्टे — को वेंचर कैपिटल नहीं चाहिए। उन्हें बैंक लोन, गवर्नमेंट स्कीम, या अपने मुनाफ़ा से रीनिवेश चाहिए। वो पार्ट 2 में कवर किया। ये चैप्टर इक्विटी फ़ंडरेज़िंग के बारे में है।

अगर आप स्मॉल बिज़नेस चला रहे हैं, तो ये चैप्टर छोड़ सकते हैं। लेकिन पढ़ लें — पता चलेगा कि टेक फ़ाउंडर दोस्त क्या गेम खेल रहे हैं।


पैसे कब रेज़ करें (और कब नहीं)

पैसे रेज़ करना कोई माइलस्टोन नहीं है। कोई मेडल नहीं है। हर रुपया जो निवेशक से लेते हो, वो फ़्यूचर में रिटर्न देना पड़ेगा। उसके साथ स्ट्रिंग्स आती हैं — उम्मीदें, टाइमलाइन्स, बोर्ड सीट्स, बढ़त का प्रेशर।

पैसे रेज़ करो जब:

  • कुछ बनाया है जो काम कर रहा है (छोटे स्केल पर भी)
  • एविडेंस है कि ग्राहकों इसे चाहते हैं (ट्रैक्शन, राजस्व, एंगेजमेंट)
  • राजस्व से ज़्यादा तेज़ ग्रो करने के लिए कैपिटल चाहिए
  • मार्केट ऑपर्च्यूनिटी टाइम-सेंसिटिव है — तेज़ नहीं चले तो कोई और चल देगा
  • पता है पैसे कहाँ ख़र्च करने हैं (हायरिंग, टेक, एक्सपैंशन)

पैसे रेज़ मत करो जब:

  • सिर्फ़ आइडिया है और पिच डेक — उत्पाद नहीं, ग्राहकों नहीं
  • "वैलिडेशन" चाहिए — निवेशक वैलिडेटर्स नहीं हैं, ग्राहकों हैं
  • अपने दम पर फ़ायदेमंदी ग्रो कर सकते हो (बूटस्ट्रैपिंग सुपरपावर है)
  • इसलिए रेज़ कर रहे हो कि बैच में सब रेज़ कर रहे हैं
  • पता नहीं पैसों का क्या करोगे

प्रिया ने 8 महीने वेट किया फ़ंडरेज़िंग सोचने से पहले। वर्किंग उत्पाद था, रियल फ़ार्मर्स थे, रियल बायर्स थे, रियल राजस्व था। इसीलिए निवेशक सुनते। अगर सिर्फ़ आइडिया लेकर गई होती? बात ही अलग होती।

सही ऑर्डर: कुछ बनाओ → लोगों से इस्तेमाल करवाओ → प्रूव करो कि काम करता है → फिर पैसे रेज़ करो।

नहीं: पैसे लो → फिर सोचो क्या बनाना है।


फ़ंडिंग राउंड्स के टाइप्स

स्टार्टअप फ़ंडरेज़िंग चरणेस में होता है। हर चरण का एक नाम है, एक टिपिकल अमाउंट है, और एक पर्पज़ है।

प्री-सीड

अमाउंट: ₹10 लाख से ₹50 लाख किससे: फ़्रेंड्स, फ़ैमिली, एंजेल निवेशक, अपनी सेविंग्स पर्पज़: उत्पाद का पहला वर्शन (MVP) बनाना, शुरुआती इस्तेमालर्स लाना

ये "आइडिया है, प्रोटोटाइप है, ठीक से बिल्ड करने और टेस्ट करने के लिए पैसे चाहिए" वाला चरण है। बहुत फ़ाउंडर्स ये चरण ख़ुद फ़ंड करते हैं — इसे बूटस्ट्रैपिंग बोलते हैं।

प्रिया का सेविंग्स से ₹8 लाख — यही प्री-सीड था। बस उसने ये नाम नहीं दिया।

सीड

अमाउंट: ₹50 लाख से ₹5 करोड़ किससे: एंजेल निवेशक, सीड-चरण VC फ़ंड्स, एक्सीलरेटर्स पर्पज़: उत्पाद-मार्केट फ़िट प्रूव करना, छोटी टीम हायर करना, इस्तेमालर्स/राजस्व बढ़ाना

ये प्रिया का करंट चरण है। वर्किंग उत्पाद है, पैसे चाहिए इसे बेटर और बिगर बनाने के लिए।

सीरीज़ A

अमाउंट: ₹5 करोड़ से ₹50 करोड़ किससे: वेंचर कैपिटल फ़र्म्स पर्पज़: जो काम कर रहा है उसे स्केल करना — नए मार्केट्स, बड़ी टीम, टेक्नोलॉजी निवेश

सीरीज़ A तक साफ़ उत्पाद-मार्केट फ़िट, स्ट्रॉन्ग बढ़त मापदंड, और बड़े बिज़नेस का पाथ दिखाना ज़रूरी है।

सीरीज़ B, C, और आगे

अमाउंट: ₹50 करोड़ से सैकड़ों करोड़ किससे: बड़ी VC फ़र्म्स, बढ़त-चरण निवेशक, कभी-कभी प्राइवेट इक्विटी पर्पज़: एग्रेसिव स्केलिंग, मार्केट डॉमिनेशन, इंटरनैशनल एक्सपैंशन, IPO या एक्विज़िशन का पाथ

हर राउंड में कंपनी का कुछ पर्सेंटेज (इक्विटी) निवेशक को बेचते हो कैपिटल के बदले। जितना आगे जाओ, कंपनी उतनी वैल्यूएबल होनी चाहिए निवेश जस्टिफ़ाई करने के लिए।

प्री-सीड → सीड → सीरीज़ A → सीरीज़ B → सीरीज़ C → ... → IPO या एग्ज़िट

हर स्टार्टअप को सारे चरणेस से गुज़रना ज़रूरी नहीं। कई सफल कंपनीज़ सिर्फ़ सीड राउंड रेज़ करती हैं, फिर फ़ायदेमंद हो जाती हैं।


एंजेल निवेशक

एंजेल निवेशक वो वेल्दी इंडिविजुअल्स हैं जो अपने पर्सनल पैसे अर्ली-चरण स्टार्टअप्स में निवेश करते हैं। आम तौर पर ₹5 लाख से ₹50 लाख निवेश करते हैं।

कौन होते हैं?

  • सफल एंटरप्रेन्योर्स जिन्होंने अपनी कंपनी बेची
  • सीनियर कॉर्पोरेट एग्ज़ीक्यूटिव्स जिनके पास सेविंग्स हैं
  • पेशेवर्स (डॉक्टर्स, लॉयर्स, CAs) जिनकी आमदनी अच्छी है
  • NRIs जो इंडियन स्टार्टअप्स में निवेश करना चाहते हैं

निवेश क्यों करते हैं?

  • फ़ाइनैंशियल रिटर्न्स (होप करते हैं कंपनी बहुत वैल्यूएबल बनेगी)
  • एक्साइटमेंट — नई चीज़ का हिस्सा बनने का
  • इकोसिस्टम को वापस देना
  • नई उद्योगों और आइडियाज़ तक एक्सेस

India में कहाँ मिलेंगे:

  • Indian Angel Network (IAN) — India का सबसे पुराना और बड़ा एंजेल नेटवर्क
  • LetsVenture — ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म जो स्टार्टअप्स को एंजेल्स से कनेक्ट करता है
  • Mumbai Angels — Mumbai में एक्टिव नेटवर्क
  • Hyderabad Angels, Calcutta Angels, Chennai Angels — रीजनल नेटवर्क्स
  • AngelList India — ग्लोबल प्लेटफ़ॉर्म, इंडियन निवेशक भी
  • लोकल नेटवर्क्स — हर बड़े शहर में इनफ़ॉर्मल एंजेल ग्रुप्स हैं

एंजेल्स VCs से कैसे अलग हैं:

  • अपने ख़ुद के पैसे निवेश करते हैं (VCs दूसरों के पैसे निवेश करते हैं)
  • तेज़ फ़ैसला लेते हैं (कोई निवेश कमिटी नहीं)
  • छोटे अमाउंट्स निवेश करते हैं
  • रिटर्न्स के बारे में अक्सर ज़्यादा पेशेंट होते हैं
  • मनी के अलावा मेंटरशिप और कनेक्शन्स भी देते हैं

प्रिया का पहला निवेशक एक एंजेल था — देहरादून का एक रिटायर्ड IAS दफ़्तरर जिसने रानीखेत में छोटी फ़ार्म बनाई थी और फ़ार्मर की समस्या ख़ुद समझता था। उसने ₹15 लाख निवेश किए। स्प्रेडशीट ने कन्विंस नहीं किया — समस्या रियल थी उसके लिए। एंजेल निवेश अक्सर ऐसे ही काम करता है — पर्सनल होता है।


वेंचर कैपिटल: VCs कैसे सोचते हैं

वेंचर कैपिटल (VC) फ़र्म्स पेशेवर निवेश कंपनीज़ हैं जो बड़ी इंस्टीट्यूशन्स (पेंशन फ़ंड्स, एंडाउमेंट्स, वेल्दी फ़ैमिलीज़) से पैसे कलेक्ट करती हैं और स्टार्टअप्स में निवेश करती हैं।

VC फ़ंड कैसे काम करता है:

एक VC फ़र्म एक "फ़ंड" रेज़ करती है — मान लो ₹500 करोड़ — लिमिटेड साझेदार (LPs) से। VC फ़र्म (जनरल साझेदार, या GPs) ये पैसे 20-30 स्टार्टअप्स में निवेश करती है 3-4 साल में। प्रबंधन फ़ी चार्ज करती है (टिपिकली 2% पर ईयर) और मुनाफ़े का शेयर लेती है (टिपिकली 20%, जिसे "कैरी" बोलते हैं)।

आपको इससे क्या फ़र्क़?

क्योंकि ये शेप करता है VCs कैसे बिहेव करते हैं। उन्हें फ़ंड का 3-5x रिटर्न करना है LPs को। ₹500 करोड़ का फ़ंड है तो ₹1,500-2,500 करोड़ जेनरेट करने हैं पोर्टफ़ोलियो से। ज़्यादातर स्टार्टअप्स नाकाम करती हैं, तो जो सक्सीड करें उन्हें बड़ा सक्सीड करना पड़ता है असफलता्स कवर करने के लिए।

VCs क्या देखते हैं:

  1. बड़ा मार्केट — ऑपर्च्यूनिटी हज़ारों करोड़ की होनी चाहिए
  2. स्ट्रॉन्ग टीम — फ़ाउंडर्स जो एग्ज़ीक्यूट, एडाप्ट, और लीड कर सकें
  3. उत्पाद-मार्केट फ़िट — एविडेंस कि लोग चाहते हैं जो बना रहे हो
  4. बढ़त रेट — मंथ-ओवर-मंथ या क्वार्टर-ओवर-क्वार्टर बढ़त
  5. डिफ़ेंसिबिलिटी — कोई कॉपी क्यों नहीं कर सकता?
  6. यूनिट इकोनॉमिक्स — हर सेल इवेंचुअली फ़ायदेमंद होनी चाहिए
  7. स्केलेबिलिटी — ₹100 करोड़ या ₹1,000 करोड़ की कंपनी बन सकती है?

VCs 99% से ज़्यादा स्टार्टअप्स को ख़ारिज करते हैं। टिपिकल VC साल में 1,000+ पिचेस देखता है, 5-8 में निवेश करता है। रिजेक्शन पर्सनली मत लेना।

ऐसे सोचो: VC एक फ़ार्मर है जो 25 सेब के पेड़ लगाता है। उसे पता है ज़्यादातर बढ़िया फल नहीं देंगे। वो उन 1-2 पेड़ों की तलाश में है जो एक्स्ट्राऑर्डिनरी हार्वेस्ट दें — इतना कि पूरा बाग़ वर्थ इट हो जाए।


फ़ंडरेज़िंग प्रक्रिया

फ़ंडरेज़िंग एक फ़ेयरली प्रिडिक्टेबल प्रक्रिया पालन करता है:

चरण 1: प्रिपरेशन (2-4 हफ़्ते)

किसी निवेशक से बात करने से पहले चाहिए:

  • पिच डेक (10-12 स्लाइड्स — अगले चैप्टर में कवर करेंगे)
  • फ़ाइनैंशियल मॉडल (राजस्व प्रोजेक्शन्स, लागतें, बर्न रेट, रनवे)
  • की मापदंड रेडी (इस्तेमालर्स, राजस्व, बढ़त रेट, रिटेंशन)
  • "आस्क" साफ़ तौर पर डिफ़ाइंड (कितना, किस वैल्यूएशन पर, इससे क्या करोगे)
  • डेटा रूम (शेयर्ड फ़ोल्डर, विस्तृत डॉक्यूमेंट्स ड्यू डिलिजेंस के लिए)

चरण 2: लिस्ट बनाना (1-2 हफ़्ते)

रिसर्च करो कौन निवेशक आपके चरण और सेक्टर में निवेश करते हैं। 200 रैंडम VCs को ईमेल मत करो। 30-40 निवेशक ढूँढो जो:

  • आपके चरण पर निवेश करते हैं
  • आपके सेक्टर में निवेश करते हैं
  • आपकी ज़रूरत जितना अमाउंट निवेश करते हैं
  • फ़ाउंडर्स के लिए मददगार होने का ट्रैक रिकॉर्ड है

चरण 3: इंट्रोडक्शन्स लेना

कोल्ड ईमेल्स का सफलता रेट बहुत कम है। सबसे अच्छा तरीक़ा वॉर्म इंट्रोडक्शन है — किसी फ़ाउंडर से जिसे उन्होंने फ़ंड किया, म्यूचुअल कनेक्शन से, या इकोसिस्टम के किसी ट्रस्टेड पर्सन से।

यहाँ नेटवर्क मायने रखता है। स्टार्टअप इवेंट्स अटेंड करो। फ़ाउंडर समुदायज़ में एक्टिव रहो। रिश्ते पहले बनाओ, ज़रूरत पड़ने से।

चरण 4: पहली मीटिंग (30-60 मिनट्स)

निवेशक समझना चाहता है: समस्या क्या है? समाधान क्या है? मार्केट बड़ा क्यों है? ये टीम क्यों जीतेगी? ट्रैक्शन क्या है?

ये आपकी पिच है। कम्पेलिंग बनाओ।

चरण 5: फ़ॉलो-अप मीटिंग्स (2-4 मीटिंग्स)

इंटरेस्ट हो तो डीपर डाइव्स — उत्पाद डेमोज़, टीम मीटिंग्स, ग्राहक रेफ़रेंसेस, मार्केट एनालिसिस।

चरण 6: ड्यू डिलिजेंस (2-4 हफ़्ते)

निवेशक की टीम सब एग्ज़ामिन करती है — फ़ाइनैंशियल्स, कैप टेबल, लीगल स्ट्रक्चर, टेक स्टैक, कॉन्ट्रैक्ट्स, टीम बैकग्राउंड। ग्राहकों से बात करते हैं, साझेदार से, कभी-कभी कॉम्पिटिटर्स से भी।

चरण 7: टर्म शीट

निवेश करना हो तो टर्म शीट इश्यू होती है — निवेश के की टर्म्स आउटलाइन करने वाला डॉक्यूमेंट। ये पेशकश है। नेगोशिएट कर सकते हो।

चरण 8: लीगल डॉक्यूमेंटेशन (2-4 हफ़्ते)

दोनों तरफ़ के लॉयर्स निवेश समझौता ड्राफ़्ट करते हैं — SHA, SSA, वग़ैरह।

चरण 9: बैंक में पैसे

निवेश "क्लोज़" हो गया। बैंक अकाउंट में पैसे आ गए। अब असली काम शुरू होता है।

कुल टाइमलाइन: 3-6 महीने। कभी ज़्यादा भी। फ़ंडरेज़िंग फ़ुल-टाइम जॉब है।


टर्म शीट्स: ज़रूरी टर्म्स

वैल्यूएशन

  • प्री-मनी वैल्यूएशन: निवेश से पहले कंपनी की वर्थ
  • पोस्ट-मनी वैल्यूएशन: प्री-मनी + निवेश अमाउंट

एग्ज़ांपल: प्री-मनी वैल्यूएशन ₹3 करोड़ है, निवेशक ₹75 लाख डालता है, पोस्ट-मनी ₹3.75 करोड़। निवेशक को मिला ₹75 लाख / ₹3.75 करोड़ = 20%।

लिक्विडेशन प्रेफ़रेंस

कंपनी बिकने पर किसे पहले पैसे मिलेंगे ये तय करता है। "1x लिक्विडेशन प्रेफ़रेंस" का मतलब निवेशक को पहले उसका पूरा पैसा मिलता है, बाक़ी सबसे पहले।

बोर्ड सीट्स

निवेशक बोर्ड ऑफ़ सीधार्स में सीट चाहते हैं। बोर्ड बड़े फ़ैसले लेता है — बजट्स, सीनियर हायरिंग, फ़ंडिंग राउंड्स, एग्ज़िट्स।

टिपिकल अर्ली-चरण बोर्ड: 2 फ़ाउंडर सीट्स, 1 निवेशक सीट, 1 इंनिर्भर सीधार।

एंटी-डाइल्यूशन सुरक्षा

अगर फ़्यूचर में कंपनी कम वैल्यूएशन पर पैसे रेज़ करे ("डाउन राउंड"), तो एंटी-डाइल्यूशन क्लॉज़ निवेशक को ज़्यादा शेयर्स देकर बचाता है।

वेस्टिंग

आपके अपने शेयर्स का वेस्टिंग शेड्यूल हो सकता है — टिपिकली 4 साल, 1 साल क्लिफ़। मतलब 1 साल बाद छोड़ो तो 25% शेयर्स रखो, बाक़ी वापस।

ESOP पूल

निवेशक इस्तेमालुअली 10-15% इक्विटी ESOP पूल के लिए रखवाते हैं। हायरिंग के लिए ज़रूरी है — अच्छे टैलेंट को आकर्षित करने के लिए स्टॉक विकल्प चाहिए।

प्रिया का सबक़: 2x लिक्विडेशन प्रेफ़रेंस वाली टर्म शीट साइन करने वाली थी जब उसके मेंटर ने पकड़ा। "इसका मतलब निवेशक को दोगुना पैसा मिलेगा तुमसे पहले," उसने बताया। नेगोशिएट करके 1x पर लाई। टर्म शीट हमेशा मेंटर या लॉयर से समीक्षा करवाओ।


फ़ंडरेज़िंग कितना टाइम लेता है

रियलिटी ज़्यादातर फ़ाउंडर्स नहीं बताते:

  • ऑप्टिमिस्टिक: 2-3 महीने
  • यथार्थवादी: 3-6 महीने
  • अगर ग़लत हो जाए: 6-12 महीने

इस दौरान: 50-100 ईमेल्स, 30-40 मीटिंग्स, 25-35 रिजेक्शन्स (या वर्स, साइलेंस), 3-5 डीप डाइव्स, 1-2 टर्म शीट्स नेगोशिएट, 1 डील क्लोज़ (लकी हो तो)।

ख़तरा: फ़ंडरेज़िंग के दौरान बिज़नेस भी चलाना है। बहुत फ़ाउंडर्स सारा टाइम निवेशक से बात करने में लगा देते हैं, उत्पाद और ग्राहकों इग्नोर हो जाते हैं।

टिप: एक फ़ाउंडर फ़ंडरेज़िंग करे, दूसरा बिज़नेस चलाए। सोलो फ़ाउंडर हो तो ख़ास दिन निवेशक मीटिंग्स के लिए रखो, बाक़ी बचाो।


बूटस्ट्रैपिंग + छोटा रेज़ vs बड़ा VC राउंड

बूटस्ट्रैप्ड + एंजेलVC-फ़ंडेड
ओनरशिपज़्यादातर आपकीहर राउंड में डाइल्यूट
स्पीडधीमी, ऑर्गेनिकतेज़, एग्रेसिव
प्रेशरकम — ख़ुद को जवाब दोज़्यादा — बोर्ड, निवेशक, माइलस्टोन्स
लाभप्रदताअक्सर जल्दी फ़ायदेमंदअक्सर सालों तक घाटे वाला
कंट्रोलसब आप तय करोबोर्ड के साथ शेयर्ड फ़ैसले
असफलता मोडबिज़नेस धीरे-धीरे बंदड्रामैटिक शटडाउन, लेऑफ़्स
सफलता मोडस्टेडी आमदनीमैसिव एग्ज़िट (अगर काम करे)

प्रिया ने मिडल पाथ चुना। ₹75 लाख रेज़ किए — टीम और उत्पाद बिल्ड करने के लिए काफ़ी, लेकिन इतना नहीं कि निवेशक रेकलेसली एक्सपैंड करवाएँ। दो एंजेल्स और एक छोटा सीड फ़ंड — एग्रीकल्चर समझने वाले। 18 महीने की रनवे और वजहेबल उम्मीदें। हर स्टार्टअप को Flipkart नहीं बनना।


नॉन-मेट्रो फ़ाउंडर्स के लिए फ़ंडरेज़िंग

रूम में एलिफ़ेंट एड्रेस करते हैं। प्रिया हल्द्वानी में है, Bangalore में नहीं।

नुक़सानेस:

  1. निवेशक डेंसिटी नहीं। ज़्यादातर एंजेल्स और VCs Bangalore, Mumbai, Delhi, Pune में। कुमाऊँ में Sand Hill Road नहीं है।
  2. फ़ाउंडर नेटवर्क नहीं। Bangalore में किसी भी कॉफ़ी शॉप में 10 फ़ाउंडर्स मिल जाएँगे। हल्द्वानी में प्रिया शायद अकेली एग्री-टेक फ़ाउंडर है।
  3. इवेंट्स कम। डेमो डेज़, पिच कॉम्पिटीशन्स मेट्रोज़ में होते हैं।
  4. परसेप्शन बायस। कुछ निवेशक सोचते हैं "गंभीर स्टार्टअप" = "Bangalore दफ़्तर"।
  5. लॉजिस्टिक्स। हर निवेशक मीटिंग के लिए फ़्लाइट या 6 घंटे बस Delhi तक।

कैसे ओवरकम करें:

  1. वीडियो कॉल्स ने प्लेइंग फ़ील्ड लेवल किया। COVID के बाद ज़्यादातर पहली मीटिंग्स Zoom पर होती हैं।
  2. जगह स्ट्रेंथ हो सकता है। Uttarakhand से एग्री-टेक बनाना Koramangala के WeWork से ज़्यादा क्रेडिबल है।
  3. टेम्पररिली जहाँ निवेशक हैं वहाँ जाओ। फ़ंडरेज़िंग के दौरान 2-3 हफ़्ते Bangalore या Delhi। रोज़ 3-4 मीटिंग्स। फिर घर।
  4. एक्सीलरेटर्स लागू करो। Y Combinator, Techstars, इंडियन एक्सीलरेटर्स — इंस्टैंट क्रेडिबिलिटी और एक्सेस।
  5. बिल्ड इन पब्लिक। LinkedIn, Twitter पर जर्नी शेयर करो।
  6. गवर्नमेंट प्रोग्राम्स लेवरेज करो जो नॉन-मेट्रो स्टार्टअप्स सपोर्ट करती हैं।

प्रिया की पिच असलीी स्ट्रॉन्गर थी जगह की वजह से। "मैं ये Bangalore के को-वर्किंग स्पेस से नहीं बना रही। Uttarakhand के बागों से बना रही हूँ, हर रोज़ फ़ार्मर्स के साथ बैठकर।" एक निवेशक ने बोला ये सबसे कन्विंसिंग बात थी।


गवर्नमेंट ग्रांट्स और स्टार्टअप प्रोग्राम्स

Startup India

गवर्नमेंट ऑफ़ India का फ़्लैगशिप प्रोग्राम। फ़ायदे:

  • टैक्स एग्ज़ेम्प्शन — एलिजिबल स्टार्टअप्स को 3 साल आमदनी टैक्स छूट
  • सेल्फ़-सर्टिफ़िकेशन — सिम्प्लीफ़ाइड लेबर और एनवायरनमेंट लॉज़
  • फ़ास्ट-ट्रैक पेटेंट्स — 80% रीबेट पेटेंट फ़ाइलिंग पर
  • ईज़ी वाइंडिंग अप — नाकाम हो तो 90 दिन में बंद कर सकते हो

Atal Innovation Mission (AIM)

NITI Aayog चलाता है — Atal Incubation Centres, मेंटरशिप, ग्रांट्स।

एग्री-टेक प्रोग्राम्स

प्रिया जैसे एग्री-टेक स्टार्टअप्स के लिए:

  • RKVY-RAFTAAR — ₹25 लाख तक ग्रांट
  • NABARD प्रोग्राम्स
  • BioNest इनक्यूबेटर्स एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटीज़ में
  • स्टेट गवर्नमेंट स्कीम्स — Uttarakhand का अपना स्टार्टअप पॉलिसी है

और स्कीम्स

  • MUDRA लोन्स — ₹10 लाख तक माइक्रो एंटरप्राइज़ेस के लिए
  • Stand Up India — SC/ST और विमेन एंटरप्रेन्योर्स के लिए लोन्स
  • SIDBI फ़ंड ऑफ़ फ़ंड्स — VC/एंजेल फ़ंड्स में निवेश करता है

वॉर्निंग: गवर्नमेंट प्रोग्राम्स में पेपरवर्क और डिलेज़ होती हैं। जल्दी लागू करो, फ़ॉलो-अप करते रहो, और सिर्फ़ इन पर निर्भर मत करो। बोनस समझो, प्लान नहीं।


आम फ़ंडरेज़िंग ग़लतियाँ

1. बहुत जल्दी रेज़ करना

उत्पाद नहीं, ग्राहकों नहीं — निवेशक पूछेंगे "क्या बनाया? कौन इस्तेमाल कर रहा है?" जवाब "अभी कुछ नहीं" हो तो पास।

2. बहुत ज़्यादा रेज़ करना

₹1 करोड़ चाहिए लेकिन ₹10 करोड़ रेज़ करो — ज़रूरत से ज़्यादा इक्विटी दे दोगे।

3. बहुत कम रेज़ करना

₹75 लाख चाहिए लेकिन ₹20 लाख रेज़ करो — 6 महीने में फिर फ़ंडरेज़ करना पड़ेगा।

4. फ़ेमस निवेशक चेस करना सही निवेशक की जगह

फ़ेमस VC फ़ंड शायद Uttarakhand की एग्रीकल्चर नहीं समझे। छोटा एग्री-टेक ध्यान्ड फ़ंड बेहतर साझेदार होगा।

5. वैल्यूएशन पर बहुत एग्रेसिवली नेगोशिएट करना

सीड राउंड में स्काई-हाई वैल्यूएशन अच्छा लगता है लेकिन समस्याएँ क्रिएट करता है। नेक्स्ट राउंड लोअर वैल्यूएशन पर हो तो "डाउन राउंड" — सबको हर्ट करता है।

6. लीड निवेशक नहीं होना

मल्टीपल एंजेल्स से रेज़ कर रहे हो तो किसी एक को "लीड" करना चाहिए। लीड के बिना, राउंड क्लोज़ नहीं होता।

7. फ़ंडरेज़िंग के दौरान बिज़नेस इग्नोर करना

मापदंड ग्रो होने चाहिए फ़ंडरेज़ करते हुए। डिक्लाइनिंग नंबर्स डील किल करते हैं।

8. फ़ंडरेज़िंग को गोल मानना

पैसे रेज़ करना सफलता नहीं है। ये अनुमति है किसी और का पैसा अनसर्टेन आउटकम पर ख़र्च करने की।

9. नंबर्स नहीं जानना

निवेशक CAC, LTV, बर्न रेट पूछे और आप फ़म्बल करो — गेम ओवर।

10. बहुत जल्दी हार मानना

ज़्यादातर सफल फ़ाउंडर्स को 20+ निवेशक ने ख़ारिज किया यस से पहले।


प्रिया की फ़ंडरेज़: कैसी रही

प्रिया को साढ़े चार महीने लगे।

47 निवेशक को ईमेल किया। 22 मीटिंग्स मिलीं। 18 रिजेक्शन्स। दो निवेशक ने 3-3 मीटिंग्स के बाद घोस्ट किया। पाँच ने रियल इंटरेस्ट दिखाया। तीन ड्यू डिलिजेंस तक गए। एक ने एग्रीकल्चर "टफ़ मार्केट" बोलकर ड्रॉप कर दिया।

एंड में ₹80 लाख रेज़ हुए — प्लांड से थोड़ा ज़्यादा — दो एंजेल्स और एक छोटा सीड फ़ंड HillTech Ventures से। वैल्यूएशन ₹4 करोड़ प्री-मनी। कंपनी का 16.7% दिया।

"फ़ंडरेज़िंग सबसे मुश्किल काम था जो मैंने कभी किया," उसने पुष्पा दीदी को बताया चाय पर। "लेकिन अब असली मुश्किल शुरू होती है — इसे सही से इस्तेमाल करना।"

पुष्पा दीदी मुस्कुराईं। "यही मैंने अपने बैंक लोन के बारे में भी बोला था।"


की टेकअवेज़

  1. ट्रैक्शन होने पर रेज़ करो, सिर्फ़ आइडिया पर नहीं।
  2. अलग चरणेस समझो — प्री-सीड, सीड, सीरीज़ A — और जानो कहाँ हो।
  3. एंजेल्स पर्सनल मनी निवेश करते हैं, तेज़ होते हैं। VCs फ़ंड मनी निवेश करते हैं, बार ऊँची होती है।
  4. प्रक्रिया 3-6 महीने लेता है। प्लान अहेड, बिज़नेस चलाते रहो।
  5. टर्म शीट ध्यान से पढ़ो। वैल्यूएशन, लिक्विडेशन प्रेफ़रेंस, बोर्ड सीट्स — फ़्यूचर शेप करते हैं।
  6. बूटस्ट्रैपिंग वैलिड है। हर कंपनी को VC मनी नहीं चाहिए।
  7. मेट्रो से बाहर होना नुक़सान है — लेकिन डीलब्रेकर नहीं।
  8. गवर्नमेंट प्रोग्राम्स मदद कर सकती हैं। Startup India, RKVY-RAFTAAR, स्टेट स्कीम्स।
  9. फ़ंडरेज़िंग सफलता नहीं है। नए चैप्टर की शुरुआत है, एंड नहीं।

प्रिया के बैंक में पैसे आ गए। लेकिन यहाँ पहुँचने से पहले, उसे निवेशक के सामने खड़े होकर 15 मिनट्स में कन्विंस करना पड़ा कि आइडिया पर बेट लगाने लायक़ है। पहली बार अच्छा नहीं गया। अगले चैप्टर में देखेंगे कैसे उसने पिच ठीक की।